Duniya Chale Na Shri Ram Ke Bina Lyrics in Hindi & English

This “Duniya Chale Na Shri Ram Ke Bina” Lyrics is one of the Best Bhajan which is dedicated to Lord Rama, as well as Lord Hanumana.

And the whole Bhajan presented to a God and the Bhakt which is Shri Ram, and Shri Hanuman.

Bhajan Credits

SONGDuniya Chale Na Shri Ram Ke Bina
LABELSonetek Music
SINGERJai Shankar Chaudhary
LYRICISTTraditional

Duniya Chale Na Shri Ram Ke Bina Lyrics in Hindi

दुनिया चले ना श्री राम के बिना,
राम जी चले ना हनुमान के बिना।

जब से रामायण पढ़ ली है, एक बात मैंने समझ ली है,
रावन मरे नी श्री राम के बिना, लंका जले ना हनुमान के बिना॥

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लक्षण का बचना मुश्किल था, कौन बूटी लाने के काबिल था,
लक्षण बचे ना श्री राम के बिना, बूटी मिले ना हनुमान के बिना॥

सीता हरण की कहानी सुनो, बनवारी मेरी जुबानी सुनो,
वापिस मिला ना श्री राम के बिना, पता चले ना हनुमान के बिना॥

बैठे सिंघासन पे श्री राम जी, चरणों में बैठे हैं हनुमान जी,
मुक्ति मिला ना श्री राम के बिना, भक्ति मिले ना हनुमान के बिना॥

Duniya Chale Na Shri Ram Ke Bina Lyrics in English

Duniya Chale Na Shree Ram Ke Bina
Duniya chale na shree Ram ke bina, Ram ji chale na Hanumaan ke bina,

Duniya chale na shree Ram ke bina, Ram ji chale na Hanumaan ke bina,
Jab se Ramayan padh li hai, ek baat maine samajh li hai,
Jab se Ramayan padh li hai, ek baat maine samajh li hai,
Raawan mare na shree Ram ke bina, Lanka jale na Hanumaan ke bina,
Duniya chale na shree Ram ke bina, Ram ji chale na Hanumaan ke bina,
Lakshman ka bachna muskil tha, kaun buti lane ke kaabil tha,
Lakshman ka bachna muskil tha, kaun buti lane ke kaabil tha,
Lakshman bache na shree Ram ke bina, buti mile na Hanumaan ke bina,
Duniya chale na shree Ram ke bina, Ram ji chale na Hanumaan ke bina,

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Baithe singhaasan par Siyaramji, charano mei baithe Hanumaan ji,
Baithe singhaasan par Siyaramji, charano mei baithe Hanumaan ji,
Mukti mile na shree Ram ke bina, bhakti mile na Hanumaan ke bina,
Duniya chale na shree Ram ke bina, Ram ji chale na Hanumaan ke bina,
Sita haran ki kahaani suni, banwaari meri jubaani suno,
Sita haran ki kahaani suni, banwaari meri jubaani suno,
Sita mile na shree Ram ke bina, pata lage na Hanuman ke bina,
Duniya chale na shree Ram ke bina, Ram ji chale na Hanumaan ke bina,
Duniya chale na shree Ram ke bina, Ram ji chale na Hanumaan ke bina,
Duniya chale na shree Ram ke bina, Ram ji chale na Hanumaan ke bina,

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Sunderkand Lyrics in Hindi and English – By Prem Prakash

Sunderkand Lyrics is a Bhajan or a Story Telling Bhajan of Shri Hanuman, and majorly people like to sing this Bhajan on Tuesday.

This Bhajan i.e. Sunderkhand is Specially Created for Hanuman Ji, and you can sing this Bhajan on Tuesday because that is a Day of Hanuman Ji like you sing Hanuman Chalisa.

Bhajan Credits

SONGSundarkhand
SINGERPrem Prakash
LYRICISTKATYANI STUDIO SANJIV JI
LABELShemaroo Bhakti

Sunderkand Lyrics in Hindi

॥ॐ श्री परमात्मने नमः॥

वक्रतुण्ड महाकाय, सूर्य कोटि समप्रभ
निर्विघ्नं कुरु में देव, सर्व-कार्येशु सर्वदा
विघ्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय लम्बोदराय सकलाय जगद्धिताय |
नागाननाय श्रुतियज्ञविभूषिताय गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते |

प्रनवऊं पवनकुमार खल बन पावक ज्ञान धन।
जासु हृदय आगार बसहिं राम सर चाप धर॥

दो0-बलि बाँधत प्रभु बाढेउ सो तनु बरनि न जाई।
उभय धरी महँ दीन्ही सात प्रदच्छिन धाइ।।29।।
मंगल भवन अमंगल हारी द्रवउ सो दशरथ अजिर बिहारी

अंगद कहइ जाउँ मैं पारा। जियँ संसय कछु फिरती बारा।।
जामवंत कह तुम्ह सब लायक। पठइअ किमि सब ही कर नायक।।
कहइ रीछपति सुनु हनुमाना। का चुप साधि रहेहु बलवाना।।
पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना।।
कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं।।
राम काज लगि तब अवतारा। सुनतहिं भयउ पर्वताकारा।।
कनक बरन तन तेज बिराजा। मानहु अपर गिरिन्ह कर राजा।।
सिंहनाद करि बारहिं बारा। लीलहीं नाषउँ जलनिधि खारा।।
सहित सहाय रावनहि मारी। आनउँ इहाँ त्रिकूट उपारी।।
जामवंत मैं पूँछउँ तोही। उचित सिखावनु दीजहु मोही।।
एतना करहु तात तुम्ह जाई। सीतहि देखि कहहु सुधि आई।।
तब निज भुज बल राजिव नैना। कौतुक लागि संग कपि सेना।।

छं0–कपि सेन संग सँघारि निसिचर रामु सीतहि आनिहैं।
त्रैलोक पावन सुजसु सुर मुनि नारदादि बखानिहैं।।
जो सुनत गावत कहत समुझत परम पद नर पावई।
रघुबीर पद पाथोज मधुकर दास तुलसी गावई।।

दो0-भव भेषज रघुनाथ जसु सुनहि जे नर अरु नारि।
तिन्ह कर सकल मनोरथ सिद्ध करिहि त्रिसिरारि।।30(क)।।
सो0-नीलोत्पल तन स्याम काम कोटि सोभा अधिक।
सुनिअ तासु गुन ग्राम जासु नाम अघ खग बधिक।।30(ख)।।
मंगल भवन अमंगल हारी द्रवउ सो दशरथ अजिर बिहारी

श्री गणेशाय नमः
श्रीजानकीवल्लभो विजयते
श्रीरामचरितमानस
~~~~~~~~
पञ्चम सोपान
सुन्दरकाण्ड
शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं
ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम् ।
रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं
वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूड़ामणिम्।।1।।
नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये
सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा।
भक्तिं प्रयच्छ रघुपुङ्गव निर्भरां मे
कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च।।2।।
अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि।।3।।
मंगल भवन अमंगल हारी द्रवउ सो दशरथ अजिर बिहारी

जामवंत के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय अति भाए।।
तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई। सहि दुख कंद मूल फल खाई।।
जब लगि आवौं सीतहि देखी। होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी।।
यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा। चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा।।
सिंधु तीर एक भूधर सुंदर। कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर।।
बार बार रघुबीर सँभारी। तरकेउ पवनतनय बल भारी।।
जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता।।
जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भाँति चलेउ हनुमाना।।
जलनिधि रघुपति दूत बिचारी। तैं मैनाक होहि श्रमहारी।।

दो0- हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम।
राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम।।1।।
मंगल भवन अमंगल हारी द्रवउ सो दशरथ अजिर बिहारी
जात पवनसुत देवन्ह देखा। जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा।।
सुरसा नाम अहिन्ह कै माता। पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता।।
आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा। सुनत बचन कह पवनकुमारा।।
राम काजु करि फिरि मैं आवौं। सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं।।
तब तव बदन पैठिहउँ आई। सत्य कहउँ मोहि जान दे माई।।
कबनेहुँ जतन देइ नहिं जाना। ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना।।
जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा। कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा।।
सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ। तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ।।
जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा। तासु दून कपि रूप देखावा।।
सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा।।
बदन पइठि पुनि बाहेर आवा। मागा बिदा ताहि सिरु नावा।।
मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा। बुधि बल मरमु तोर मै पावा।।

दो0-राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान।
आसिष देह गई सो हरषि चलेउ हनुमान।।2।।
मंगल भवन अमंगल हारी द्रवउ सो दशरथ अजिर बिहारी
निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई। करि माया नभु के खग गहई।।
जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं। जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं।।
गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई। एहि बिधि सदा गगनचर खाई।।
सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा। तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा।।
ताहि मारि मारुतसुत बीरा। बारिधि पार गयउ मतिधीरा।।
तहाँ जाइ देखी बन सोभा। गुंजत चंचरीक मधु लोभा।।
नाना तरु फल फूल सुहाए। खग मृग बृंद देखि मन भाए।।
सैल बिसाल देखि एक आगें। ता पर धाइ चढेउ भय त्यागें।।
उमा न कछु कपि कै अधिकाई। प्रभु प्रताप जो कालहि खाई।।
गिरि पर चढि लंका तेहिं देखी। कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी।।
अति उतंग जलनिधि चहु पासा। कनक कोट कर परम प्रकासा।।
छं=कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना।
चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना।।
गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथिन्ह को गनै।।
बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै।।1।।
बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं।
नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं।।
कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं।
नाना अखारेन्ह भिरहिं बहु बिधि एक एकन्ह तर्जहीं।।2।।
करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं।
कहुँ महिष मानषु धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं।।
एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही।
रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही।।3।।

दो0-पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार।
अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पइसार।।3।।
मंगल भवन अमंगल हारी द्रवउ सो दशरथ अजिर बिहारी
मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी।।
नाम लंकिनी एक निसिचरी। सो कह चलेसि मोहि निंदरी।।
जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा। मोर अहार जहाँ लगि चोरा।।
मुठिका एक महा कपि हनी। रुधिर बमत धरनीं ढनमनी।।
पुनि संभारि उठि सो लंका। जोरि पानि कर बिनय संसका।।
जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा। चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा।।
बिकल होसि तैं कपि कें मारे। तब जानेसु निसिचर संघारे।।
तात मोर अति पुन्य बहूता। देखेउँ नयन राम कर दूता।।

दो0-तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग।।4।।
मंगल भवन अमंगल हारी द्रवउ सो दशरथ अजिर बिहारी
प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कौसलपुर राजा।।
गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई।।
गरुड़ सुमेरु रेनू सम ताही। राम कृपा करि चितवा जाही।।
अति लघु रूप धरेउ हनुमाना। पैठा नगर सुमिरि भगवाना।।
मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा। देखे जहँ तहँ अगनित जोधा।।
गयउ दसानन मंदिर माहीं। अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं।।
सयन किए देखा कपि तेही। मंदिर महुँ न दीखि बैदेही।।
भवन एक पुनि दीख सुहावा। हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा।।

दो0-रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ।
नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरषि कपिराइ।।5।।
मंगल भवन अमंगल हारी द्रवउ सो दशरथ अजिर बिहारी
लंका निसिचर निकर निवासा। इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा।।
मन महुँ तरक करै कपि लागा। तेहीं समय बिभीषनु जागा।।
राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा। हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा।।
एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी। साधु ते होइ न कारज हानी।।
बिप्र रुप धरि बचन सुनाए। सुनत बिभीषण उठि तहँ आए।।
करि प्रनाम पूँछी कुसलाई। बिप्र कहहु निज कथा बुझाई।।
की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई। मोरें हृदय प्रीति अति होई।।
की तुम्ह रामु दीन अनुरागी। आयहु मोहि करन बड़भागी।।

दो0-तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम।
सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम।।6।।
मंगल भवन अमंगल हारी द्रवउ सो दशरथ अजिर बिहारी
सुनहु पवनसुत रहनि हमारी। जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी।।
तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा। करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा।।
तामस तनु कछु साधन नाहीं। प्रीति न पद सरोज मन माहीं।।
अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता।।
जौ रघुबीर अनुग्रह कीन्हा। तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा।।
सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती। करहिं सदा सेवक पर प्रीती।।
कहहु कवन मैं परम कुलीना। कपि चंचल सबहीं बिधि हीना।।
प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा।।

दो0-अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।
कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर।।7।।
मंगल भवन अमंगल हारी द्रवउ सो दशरथ अजिर बिहारी
जानतहूँ अस स्वामि बिसारी। फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी।।
एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा। पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा।।
पुनि सब कथा बिभीषन कही। जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही।।
तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता। देखी चहउँ जानकी माता।।
जुगुति बिभीषन सकल सुनाई। चलेउ पवनसुत बिदा कराई।।
करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ। बन असोक सीता रह जहवाँ।।
देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा। बैठेहिं बीति जात निसि जामा।।
कृस तन सीस जटा एक बेनी। जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी।।

दो0-निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन।
परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन।।8।।
मंगल भवन अमंगल हारी द्रवउ सो दशरथ अजिर बिहारी
तरु पल्लव महुँ रहा लुकाई। करइ बिचार करौं का भाई।।
तेहि अवसर रावनु तहँ आवा। संग नारि बहु किएँ बनावा।।
बहु बिधि खल सीतहि समुझावा। साम दान भय भेद देखावा।।
कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी। मंदोदरी आदि सब रानी।।
तव अनुचरीं करउँ पन मोरा। एक बार बिलोकु मम ओरा।।
तृन धरि ओट कहति बैदेही। सुमिरि अवधपति परम सनेही।।
सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा। कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा।।
अस मन समुझु कहति जानकी। खल सुधि नहिं रघुबीर बान की।।
सठ सूने हरि आनेहि मोहि। अधम निलज्ज लाज नहिं तोही।।

दो0- आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान।
परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन।।9।।
मंगल भवन अमंगल हारी द्रवउ सो दशरथ अजिर बिहारी
सीता तैं मम कृत अपमाना। कटिहउँ तव सिर कठिन कृपाना।।
नाहिं त सपदि मानु मम बानी। सुमुखि होति न त जीवन हानी।।
स्याम सरोज दाम सम सुंदर। प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर।।
सो भुज कंठ कि तव असि घोरा। सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा।।
चंद्रहास हरु मम परितापं। रघुपति बिरह अनल संजातं।।
सीतल निसित बहसि बर धारा। कह सीता हरु मम दुख भारा।।
सुनत बचन पुनि मारन धावा। मयतनयाँ कहि नीति बुझावा।।
कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई। सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई।।
मास दिवस महुँ कहा न माना। तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना।।

दो0-भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद।
सीतहि त्रास देखावहि धरहिं रूप बहु मंद।।10।।
मंगल भवन अमंगल हारी द्रवउ सो दशरथ अजिर बिहारी
त्रिजटा नाम राच्छसी एका। राम चरन रति निपुन बिबेका।।
सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना। सीतहि सेइ करहु हित अपना।।
सपनें बानर लंका जारी। जातुधान सेना सब मारी।।
खर आरूढ़ नगन दससीसा। मुंडित सिर खंडित भुज बीसा।।
एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई। लंका मनहुँ बिभीषन पाई।।
नगर फिरी रघुबीर दोहाई। तब प्रभु सीता बोलि पठाई।।
यह सपना में कहउँ पुकारी। होइहि सत्य गएँ दिन चारी।।
तासु बचन सुनि ते सब डरीं। जनकसुता के चरनन्हि परीं।।

दो0-जहँ तहँ गईं सकल तब सीता कर मन सोच।
मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच।।11।।
मंगल भवन अमंगल हारी द्रवउ सो दशरथ अजिर बिहारी
त्रिजटा सन बोली कर जोरी। मातु बिपति संगिनि तैं मोरी।।
तजौं देह करु बेगि उपाई। दुसहु बिरहु अब नहिं सहि जाई।।
आनि काठ रचु चिता बनाई। मातु अनल पुनि देहि लगाई।।
सत्य करहि मम प्रीति सयानी। सुनै को श्रवन सूल सम बानी।।
सुनत बचन पद गहि समुझाएसि। प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि।।
निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी। अस कहि सो निज भवन सिधारी।।
कह सीता बिधि भा प्रतिकूला। मिलहि न पावक मिटिहि न सूला।।
देखिअत प्रगट गगन अंगारा। अवनि न आवत एकउ तारा।।
पावकमय ससि स्त्रवत न आगी। मानहुँ मोहि जानि हतभागी।।
सुनहि बिनय मम बिटप असोका। सत्य नाम करु हरु मम सोका।।
नूतन किसलय अनल समाना। देहि अगिनि जनि करहि निदाना।।
देखि परम बिरहाकुल सीता। सो छन कपिहि कलप सम बीता।।
सो0-कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारी तब।
जनु असोक अंगार दीन्हि हरषि उठि कर गहेउ।।12।।
तब देखी मुद्रिका मनोहर। राम नाम अंकित अति सुंदर।।
चकित चितव मुदरी पहिचानी। हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी।।
जीति को सकइ अजय रघुराई। माया तें असि रचि नहिं जाई।।
सीता मन बिचार कर नाना। मधुर बचन बोलेउ हनुमाना।।
रामचंद्र गुन बरनैं लागा। सुनतहिं सीता कर दुख भागा।।
लागीं सुनैं श्रवन मन लाई। आदिहु तें सब कथा सुनाई।।
श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई। कहि सो प्रगट होति किन भाई।।
तब हनुमंत निकट चलि गयऊ। फिरि बैंठीं मन बिसमय भयऊ।।
राम दूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान की।।
यह मुद्रिका मातु मैं आनी। दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी।।
नर बानरहि संग कहु कैसें। कहि कथा भइ संगति जैसें।।

दो0-कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास।।
जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास।।13।।
मंगल भवन अमंगल हारी द्रवउ सो दशरथ अजिर बिहारी
हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी। सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी।।
बूड़त बिरह जलधि हनुमाना। भयउ तात मों कहुँ जलजाना।।
अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी। अनुज सहित सुख भवन खरारी।।
कोमलचित कृपाल रघुराई। कपि केहि हेतु धरी निठुराई।।
सहज बानि सेवक सुख दायक। कबहुँक सुरति करत रघुनायक।।
कबहुँ नयन मम सीतल ताता। होइहहि निरखि स्याम मृदु गाता।।
बचनु न आव नयन भरे बारी। अहह नाथ हौं निपट बिसारी।।
देखि परम बिरहाकुल सीता। बोला कपि मृदु बचन बिनीता।।
मातु कुसल प्रभु अनुज समेता। तव दुख दुखी सुकृपा निकेता।।
जनि जननी मानहु जियँ ऊना। तुम्ह ते प्रेमु राम कें दूना।।

दो0-रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर।
अस कहि कपि गद गद भयउ भरे बिलोचन नीर।।14।।
मंगल भवन अमंगल हारी द्रवउ सो दशरथ अजिर बिहारी

कहेउ राम बियोग तव सीता। मो कहुँ सकल भए बिपरीता।।
नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू। कालनिसा सम निसि ससि भानू।।
कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा। बारिद तपत तेल जनु बरिसा।।
जे हित रहे करत तेइ पीरा। उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा।।
कहेहू तें कछु दुख घटि होई। काहि कहौं यह जान न कोई।।
तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा। जानत प्रिया एकु मनु मोरा।।
सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतेनहि माहीं।।
प्रभु संदेसु सुनत बैदेही। मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही।।
कह कपि हृदयँ धीर धरु माता। सुमिरु राम सेवक सुखदाता।।
उर आनहु रघुपति प्रभुताई। सुनि मम बचन तजहु कदराई।।

दो0-निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु।
जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु।।15।।
मंगल भवन अमंगल हारी द्रवउ सो दशरथ अजिर बिहारी
जौं रघुबीर होति सुधि पाई। करते नहिं बिलंबु रघुराई।।
रामबान रबि उएँ जानकी। तम बरूथ कहँ जातुधान की।।
अबहिं मातु मैं जाउँ लवाई। प्रभु आयसु नहिं राम दोहाई।।
कछुक दिवस जननी धरु धीरा। कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा।।
निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं। तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं।।
हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना। जातुधान अति भट बलवाना।।
मोरें हृदय परम संदेहा। सुनि कपि प्रगट कीन्ह निज देहा।।
कनक भूधराकार सरीरा। समर भयंकर अतिबल बीरा।।
सीता मन भरोस तब भयऊ। पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ।।

दो0-सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल।
प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल।।16।।
मंगल भवन अमंगल हारी द्रवउ सो दशरथ अजिर बिहारी
मन संतोष सुनत कपि बानी। भगति प्रताप तेज बल सानी।।
आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना। होहु तात बल सील निधाना।।
अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुँ बहुत रघुनायक छोहू।।
करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना। निर्भर प्रेम मगन हनुमाना।।
बार बार नाएसि पद सीसा। बोला बचन जोरि कर कीसा।।
अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता। आसिष तव अमोघ बिख्याता।।
सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा। लागि देखि सुंदर फल रूखा।।
सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी। परम सुभट रजनीचर भारी।।
तिन्ह कर भय माता मोहि नाहीं। जौं तुम्ह सुख मानहु मन माहीं।।

दो0-देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु।
रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु।।17।।
मंगल भवन अमंगल हारी द्रवउ सो दशरथ अजिर बिहारी
चलेउ नाइ सिरु पैठेउ बागा। फल खाएसि तरु तोरैं लागा।।
रहे तहाँ बहु भट रखवारे। कछु मारेसि कछु जाइ पुकारे।।
नाथ एक आवा कपि भारी। तेहिं असोक बाटिका उजारी।।
खाएसि फल अरु बिटप उपारे। रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे।।
सुनि रावन पठए भट नाना। तिन्हहि देखि गर्जेउ हनुमाना।।
सब रजनीचर कपि संघारे। गए पुकारत कछु अधमारे।।
पुनि पठयउ तेहिं अच्छकुमारा। चला संग लै सुभट अपारा।।
आवत देखि बिटप गहि तर्जा। ताहि निपाति महाधुनि गर्जा।।

दो0-कछु मारेसि कछु मर्देसि कछु मिलएसि धरि धूरि।
कछु पुनि जाइ पुकारे प्रभु मर्कट बल भूरि।।18।।
मंगल भवन अमंगल हारी द्रवउ सो दशरथ अजिर बिहारी
सुनि सुत बध लंकेस रिसाना। पठएसि मेघनाद बलवाना।।
मारसि जनि सुत बांधेसु ताही। देखिअ कपिहि कहाँ कर आही।।
चला इंद्रजित अतुलित जोधा। बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा।।
कपि देखा दारुन भट आवा। कटकटाइ गर्जा अरु धावा।।
अति बिसाल तरु एक उपारा। बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा।।
रहे महाभट ताके संगा। गहि गहि कपि मर्दइ निज अंगा।।
तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा। भिरे जुगल मानहुँ गजराजा।
मुठिका मारि चढ़ा तरु जाई। ताहि एक छन मुरुछा आई।।
उठि बहोरि कीन्हिसि बहु माया। जीति न जाइ प्रभंजन जाया।।

दो0-ब्रह्म अस्त्र तेहिं साँधा कपि मन कीन्ह बिचार।
जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार।।19।।
मंगल भवन अमंगल हारी द्रवउ सो दशरथ अजिर बिहारी
ब्रह्मबान कपि कहुँ तेहि मारा। परतिहुँ बार कटकु संघारा।।
तेहि देखा कपि मुरुछित भयऊ। नागपास बाँधेसि लै गयऊ।।
जासु नाम जपि सुनहु भवानी। भव बंधन काटहिं नर ग्यानी।।
तासु दूत कि बंध तरु आवा। प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा।।
कपि बंधन सुनि निसिचर धाए। कौतुक लागि सभाँ सब आए।।
दसमुख सभा दीखि कपि जाई। कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई।।
कर जोरें सुर दिसिप बिनीता। भृकुटि बिलोकत सकल सभीता।।
देखि प्रताप न कपि मन संका। जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असंका।।

दो0-कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद।
सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिषाद।।20।।
मंगल भवन अमंगल हारी द्रवउ सो दशरथ अजिर बिहारी
कह लंकेस कवन तैं कीसा। केहिं के बल घालेहि बन खीसा।।
की धौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही। देखउँ अति असंक सठ तोही।।
मारे निसिचर केहिं अपराधा। कहु सठ तोहि न प्रान कइ बाधा।।
सुन रावन ब्रह्मांड निकाया। पाइ जासु बल बिरचित माया।।
जाकें बल बिरंचि हरि ईसा। पालत सृजत हरत दससीसा।
जा बल सीस धरत सहसानन। अंडकोस समेत गिरि कानन।।
धरइ जो बिबिध देह सुरत्राता। तुम्ह ते सठन्ह सिखावनु दाता।
हर कोदंड कठिन जेहि भंजा। तेहि समेत नृप दल मद गंजा।।
खर दूषन त्रिसिरा अरु बाली। बधे सकल अतुलित बलसाली।।

दो0-जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि।
तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि।।21।।
मंगल भवन अमंगल हारी द्रवउ सो दशरथ अजिर बिहारी

जानउँ मैं तुम्हारि प्रभुताई। सहसबाहु सन परी लराई।।
समर बालि सन करि जसु पावा। सुनि कपि बचन बिहसि बिहरावा।।
खायउँ फल प्रभु लागी भूँखा। कपि सुभाव तें तोरेउँ रूखा।।
सब कें देह परम प्रिय स्वामी। मारहिं मोहि कुमारग गामी।।
जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे। तेहि पर बाँधेउ तनयँ तुम्हारे।।
मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा। कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा।।
बिनती करउँ जोरि कर रावन। सुनहु मान तजि मोर सिखावन।।
देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी। भ्रम तजि भजहु भगत भय हारी।।
जाकें डर अति काल डेराई। जो सुर असुर चराचर खाई।।
तासों बयरु कबहुँ नहिं कीजै। मोरे कहें जानकी दीजै।।

दो0-प्रनतपाल रघुनायक करुना सिंधु खरारि।
गएँ सरन प्रभु राखिहैं तव अपराध बिसारि।।22।।
मंगल भवन अमंगल हारी द्रवउ सो दशरथ अजिर बिहारी

राम चरन पंकज उर धरहू। लंका अचल राज तुम्ह करहू।।
रिषि पुलिस्त जसु बिमल मंयका। तेहि ससि महुँ जनि होहु कलंका।।
राम नाम बिनु गिरा न सोहा। देखु बिचारि त्यागि मद मोहा।।
बसन हीन नहिं सोह सुरारी। सब भूषण भूषित बर नारी।।
राम बिमुख संपति प्रभुताई। जाइ रही पाई बिनु पाई।।
सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं। बरषि गए पुनि तबहिं सुखाहीं।।
सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी। बिमुख राम त्राता नहिं कोपी।।
संकर सहस बिष्नु अज तोही। सकहिं न राखि राम कर द्रोही।।

दो0-मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान।
भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान।।23।।
मंगल भवन अमंगल हारी द्रवउ सो दशरथ अजिर बिहारी
जदपि कहि कपि अति हित बानी। भगति बिबेक बिरति नय सानी।।
बोला बिहसि महा अभिमानी। मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी।।
मृत्यु निकट आई खल तोही। लागेसि अधम सिखावन मोही।।
उलटा होइहि कह हनुमाना। मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना।।
सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना। बेगि न हरहुँ मूढ़ कर प्राना।।
सुनत निसाचर मारन धाए। सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए।
नाइ सीस करि बिनय बहूता। नीति बिरोध न मारिअ दूता।।
आन दंड कछु करिअ गोसाँई। सबहीं कहा मंत्र भल भाई।।
सुनत बिहसि बोला दसकंधर। अंग भंग करि पठइअ बंदर।।
दो-कपि कें ममता पूँछ पर सबहि कहउँ समुझाइ।
तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ।।24।।
मंगल भवन अमंगल हारी द्रवउ सो दशरथ अजिर बिहारी

पूँछहीन बानर तहँ जाइहि। तब सठ निज नाथहि लइ आइहि।।
जिन्ह कै कीन्हसि बहुत बड़ाई। देखेउँûमैं तिन्ह कै प्रभुताई।।
बचन सुनत कपि मन मुसुकाना। भइ सहाय सारद मैं जाना।।
जातुधान सुनि रावन बचना। लागे रचैं मूढ़ सोइ रचना।।
रहा न नगर बसन घृत तेला। बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला।।
कौतुक कहँ आए पुरबासी। मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी।।
बाजहिं ढोल देहिं सब तारी। नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी।।
पावक जरत देखि हनुमंता। भयउ परम लघु रुप तुरंता।।
निबुकि चढ़ेउ कपि कनक अटारीं। भई सभीत निसाचर नारीं।।

दो0-हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।
अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास।।25।।
मंगल भवन अमंगल हारी द्रवउ सो दशरथ अजिर बिहारी

देह बिसाल परम हरुआई। मंदिर तें मंदिर चढ़ धाई।।
जरइ नगर भा लोग बिहाला। झपट लपट बहु कोटि कराला।।
तात मातु हा सुनिअ पुकारा। एहि अवसर को हमहि उबारा।।
हम जो कहा यह कपि नहिं होई। बानर रूप धरें सुर कोई।।
साधु अवग्या कर फलु ऐसा। जरइ नगर अनाथ कर जैसा।।
जारा नगरु निमिष एक माहीं। एक बिभीषन कर गृह नाहीं।।
ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा। जरा न सो तेहि कारन गिरिजा।।
उलटि पलटि लंका सब जारी। कूदि परा पुनि सिंधु मझारी।।

दो0-पूँछ बुझाइ खोइ श्रम धरि लघु रूप बहोरि।
जनकसुता के आगें ठाढ़ भयउ कर जोरि।।26।।
मंगल भवन अमंगल हारी द्रवउ सो दशरथ अजिर बिहारी

मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा। जैसें रघुनायक मोहि दीन्हा।।
चूड़ामनि उतारि तब दयऊ। हरष समेत पवनसुत लयऊ।।
कहेहु तात अस मोर प्रनामा। सब प्रकार प्रभु पूरनकामा।।
दीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ मम संकट भारी।।
तात सक्रसुत कथा सुनाएहु। बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु।।
मास दिवस महुँ नाथु न आवा। तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा।।
कहु कपि केहि बिधि राखौं प्राना। तुम्हहू तात कहत अब जाना।।
तोहि देखि सीतलि भइ छाती। पुनि मो कहुँ सोइ दिनु सो राती।।

दो0-जनकसुतहि समुझाइ करि बहु बिधि धीरजु दीन्ह।
चरन कमल सिरु नाइ कपि गवनु राम पहिं कीन्ह।।27।।
मंगल भवन अमंगल हारी द्रवउ सो दशरथ अजिर बिहारी

चलत महाधुनि गर्जेसि भारी। गर्भ स्त्रवहिं सुनि निसिचर नारी।।
नाघि सिंधु एहि पारहि आवा। सबद किलकिला कपिन्ह सुनावा।।
हरषे सब बिलोकि हनुमाना। नूतन जन्म कपिन्ह तब जाना।।
मुख प्रसन्न तन तेज बिराजा। कीन्हेसि रामचन्द्र कर काजा।।
मिले सकल अति भए सुखारी। तलफत मीन पाव जिमि बारी।।
चले हरषि रघुनायक पासा। पूँछत कहत नवल इतिहासा।।
तब मधुबन भीतर सब आए। अंगद संमत मधु फल खाए।।
रखवारे जब बरजन लागे। मुष्टि प्रहार हनत सब भागे।।

दो0-जाइ पुकारे ते सब बन उजार जुबराज।
सुनि सुग्रीव हरष कपि करि आए प्रभु काज।।28।।
मंगल भवन अमंगल हारी द्रवउ सो दशरथ अजिर बिहारी

जौं न होति सीता सुधि पाई। मधुबन के फल सकहिं कि खाई।।
एहि बिधि मन बिचार कर राजा। आइ गए कपि सहित समाजा।।
आइ सबन्हि नावा पद सीसा। मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा।।
पूँछी कुसल कुसल पद देखी। राम कृपाँ भा काजु बिसेषी।।
नाथ काजु कीन्हेउ हनुमाना। राखे सकल कपिन्ह के प्राना।।
सुनि सुग्रीव बहुरि तेहि मिलेऊ। कपिन्ह सहित रघुपति पहिं चलेऊ।
राम कपिन्ह जब आवत देखा। किएँ काजु मन हरष बिसेषा।।
फटिक सिला बैठे द्वौ भाई। परे सकल कपि चरनन्हि जाई।।

दो0-प्रीति सहित सब भेटे रघुपति करुना पुंज।
पूँछी कुसल नाथ अब कुसल देखि पद कंज।।29।।
मंगल भवन अमंगल हारी द्रवउ सो दशरथ अजिर बिहारी

जामवंत कह सुनु रघुराया। जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया।।
ताहि सदा सुभ कुसल निरंतर। सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर।।
सोइ बिजई बिनई गुन सागर। तासु सुजसु त्रेलोक उजागर।।
प्रभु कीं कृपा भयउ सबु काजू। जन्म हमार सुफल भा आजू।।
नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी। सहसहुँ मुख न जाइ सो बरनी।।
पवनतनय के चरित सुहाए। जामवंत रघुपतिहि सुनाए।।
सुनत कृपानिधि मन अति भाए। पुनि हनुमान हरषि हियँ लाए।।
कहहु तात केहि भाँति जानकी। रहति करति रच्छा स्वप्रान की।।

दो0-नाम पाहरु दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट।
लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट।।30।।
मंगल भवन अमंगल हारी द्रवउ सो दशरथ अजिर बिहारी

चलत मोहि चूड़ामनि दीन्ही। रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही।।
नाथ जुगल लोचन भरि बारी। बचन कहे कछु जनककुमारी।।
अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना। दीन बंधु प्रनतारति हरना।।
मन क्रम बचन चरन अनुरागी। केहि अपराध नाथ हौं त्यागी।।
अवगुन एक मोर मैं माना। बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना।।
नाथ सो नयनन्हि को अपराधा। निसरत प्रान करिहिं हठि बाधा।।
बिरह अगिनि तनु तूल समीरा। स्वास जरइ छन माहिं सरीरा।।
नयन स्त्रवहि जलु निज हित लागी। जरैं न पाव देह बिरहागी।
सीता के अति बिपति बिसाला। बिनहिं कहें भलि दीनदयाला।।
दो0-निमिष निमिष करुनानिधि जाहिं कलप सम बीति।
बेगि चलिय प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति।।31।।
मंगल भवन अमंगल हारी द्रवउ सो दशरथ अजिर बिहारी

सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना। भरि आए जल राजिव नयना।।
बचन काँय मन मम गति जाही। सपनेहुँ बूझिअ बिपति कि ताही।।
कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन न होई।।
केतिक बात प्रभु जातुधान की। रिपुहि जीति आनिबी जानकी।।
सुनु कपि तोहि समान उपकारी। नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी।।
प्रति उपकार करौं का तोरा। सनमुख होइ न सकत मन मोरा।।
सुनु सुत उरिन मैं नाहीं। देखेउँ करि बिचार मन माहीं।।
पुनि पुनि कपिहि चितव सुरत्राता। लोचन नीर पुलक अति गाता।।

दो0-सुनि प्रभु बचन बिलोकि मुख गात हरषि हनुमंत।
चरन परेउ प्रेमाकुल त्राहि त्राहि भगवंत।।32।।
मंगल भवन अमंगल हारी द्रवउ सो दशरथ अजिर बिहारी

बार बार प्रभु चहइ उठावा। प्रेम मगन तेहि उठब न भावा।।
प्रभु कर पंकज कपि कें सीसा। सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा।।
सावधान मन करि पुनि संकर। लागे कहन कथा अति सुंदर।।
कपि उठाइ प्रभु हृदयँ लगावा। कर गहि परम निकट बैठावा।।
कहु कपि रावन पालित लंका। केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका।।
प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना। बोला बचन बिगत अभिमाना।।
साखामृग के बड़ि मनुसाई। साखा तें साखा पर जाई।।
नाघि सिंधु हाटकपुर जारा। निसिचर गन बिधि बिपिन उजारा।
सो सब तव प्रताप रघुराई। नाथ न कछू मोरि प्रभुताई।।

दो0- ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकुल।
तब प्रभावँ बड़वानलहिं जारि सकइ खलु तूल।।33।।
मंगल भवन अमंगल हारी द्रवउ सो दशरथ अजिर बिहारी

नाथ भगति अति सुखदायनी। देहु कृपा करि अनपायनी।।
सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी। एवमस्तु तब कहेउ भवानी।।
उमा राम सुभाउ जेहिं जाना। ताहि भजनु तजि भाव न आना।।
यह संवाद जासु उर आवा। रघुपति चरन भगति सोइ पावा।।
सुनि प्रभु बचन कहहिं कपिबृंदा। जय जय जय कृपाल सुखकंदा।।
तब रघुपति कपिपतिहि बोलावा। कहा चलैं कर करहु बनावा।।
अब बिलंबु केहि कारन कीजे। तुरत कपिन्ह कहुँ आयसु दीजे।।
कौतुक देखि सुमन बहु बरषी। नभ तें भवन चले सुर हरषी।।

दो0-कपिपति बेगि बोलाए आए जूथप जूथ।
नाना बरन अतुल बल बानर भालु बरूथ।।34।।
मंगल भवन अमंगल हारी द्रवउ सो दशरथ अजिर बिहारी

प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा। गरजहिं भालु महाबल कीसा।।
देखी राम सकल कपि सेना। चितइ कृपा करि राजिव नैना।।
राम कृपा बल पाइ कपिंदा। भए पच्छजुत मनहुँ गिरिंदा।।
हरषि राम तब कीन्ह पयाना। सगुन भए सुंदर सुभ नाना।।
जासु सकल मंगलमय कीती। तासु पयान सगुन यह नीती।।
प्रभु पयान जाना बैदेहीं। फरकि बाम अँग जनु कहि देहीं।।
जोइ जोइ सगुन जानकिहि होई। असगुन भयउ रावनहि सोई।।
चला कटकु को बरनैं पारा। गर्जहि बानर भालु अपारा।।
नख आयुध गिरि पादपधारी। चले गगन महि इच्छाचारी।।
केहरिनाद भालु कपि करहीं। डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं।।
छं0-चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे।
मन हरष सभ गंधर्ब सुर मुनि नाग किन्नर दुख टरे।।
कटकटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं।
जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं।।1।।
सहि सक न भार उदार अहिपति बार बारहिं मोहई।
गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ट कठोर सो किमि सोहई।।
रघुबीर रुचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी।
जनु कमठ खर्पर सर्पराज सो लिखत अबिचल पावनी।।2।।

दो0-एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर।
जहँ तहँ लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर।।35।।
मंगल भवन अमंगल हारी द्रवउ सो दशरथ अजिर बिहारी
उहाँ निसाचर रहहिं ससंका। जब ते जारि गयउ कपि लंका।।
निज निज गृहँ सब करहिं बिचारा। नहिं निसिचर कुल केर उबारा।।
जासु दूत बल बरनि न जाई। तेहि आएँ पुर कवन भलाई।।
दूतन्हि सन सुनि पुरजन बानी। मंदोदरी अधिक अकुलानी।।
रहसि जोरि कर पति पग लागी। बोली बचन नीति रस पागी।।
कंत करष हरि सन परिहरहू। मोर कहा अति हित हियँ धरहु।।
समुझत जासु दूत कइ करनी। स्त्रवहीं गर्भ रजनीचर धरनी।।
तासु नारि निज सचिव बोलाई। पठवहु कंत जो चहहु भलाई।।
तब कुल कमल बिपिन दुखदाई। सीता सीत निसा सम आई।।
सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें। हित न तुम्हार संभु अज कीन्हें।।

दो0–राम बान अहि गन सरिस निकर निसाचर भेक।
जब लगि ग्रसत न तब लगि जतनु करहु तजि टेक।।36।।
मंगल भवन अमंगल हारी द्रवउ सो दशरथ अजिर बिहारी

श्रवन सुनी सठ ता करि बानी। बिहसा जगत बिदित अभिमानी।।
सभय सुभाउ नारि कर साचा। मंगल महुँ भय मन अति काचा।।
जौं आवइ मर्कट कटकाई। जिअहिं बिचारे निसिचर खाई।।
कंपहिं लोकप जाकी त्रासा। तासु नारि सभीत बड़ि हासा।।
अस कहि बिहसि ताहि उर लाई। चलेउ सभाँ ममता अधिकाई।।
मंदोदरी हृदयँ कर चिंता। भयउ कंत पर बिधि बिपरीता।।
बैठेउ सभाँ खबरि असि पाई। सिंधु पार सेना सब आई।।
बूझेसि सचिव उचित मत कहहू। ते सब हँसे मष्ट करि रहहू।।
जितेहु सु

Sunderkand Lyrics in English

|| Shalok ||
Shaantan shaashvatamaprameyamanaghan nirvaanashaantipradan.
Brahmaashambhuphaneendrasevyamanishan vedaantavedyan vibhum.
Raamaakhyan jagadeeshvaran suragurun maayaamanushyan harin.
Vandehan karunaakaran raghuvaran bhoopaalachoodaamanim ||1||
 
Naanya sprha raghupate hrdayesmadeeye.
Satyan vadaami ch bhavaanakhilaantaraatma.
Bhaktin prayachchh raghupungav nirbharaan me.
Kaamaadidosharahitan kuru maanasan ch ||2||
 
Atulitabaladhaaman hemashailaabhadehan.
Danujavanakrshaanun gyaaninaamagraganyam.
Sakalagunanidhaanan vaanaraanaamadheeshan.

|| Chopai ||
Jaamavant ke bachan suhae. suni hanumant hrday ati bhae.
Tab lagi mohi parikhehu tumh bhaee. sahi dukh kand mool phal khaee.
Jab lagi aavaun seetahi dekhee. hoihi kaaju mohi harash biseshee.
Yah kahi nai sabanhi kahun maatha. chaleu harashi hiyan dhari raghunaatha.
Sindhu teer ek bhoodhar sundar. kautuk koodi chadheu ta oopar.
Baar-baar raghubeer sanbhaaree. tarakeu pavanatanay bal bhaaree.
Jehin giri charan dei hanumanta. chaleu so ga paataal turanta.
Jimi amogh raghupati kar baana. ehee bhaanti chaleu hanumaana.
Jalanidhi raghupati doot bichaaree. tain mainaak hohi shram haaree.
 
|| Doha – 1 ||
Hanumaan tehi parasa kar puni keenh pranaam |
Raam kaaju keenhe binu mohi kahaa bishraam ||

||Chopai||
Jaat pavansut devanh dekha | Jaanai kahu bal buddhi bisesha ||
Surasa naam ahinh kai maata | Pathainhi aai kahi tehi baata ||
Aaju suranh mohi deenh ahaara | Sunat bachan kah pavankumaara ||
Raam kaaju kari phiri mai aavau | Sita kai sudhi prabhuhi sunaavau ||
Tab tav badan paithihau aai | Satya kahau mohi jaan de maai ||
Kavanehu jatan dei nahi jaana | Grasai na mohi kaheu Hanumaana||
Jojan bhari tehi badanu pasaara | Kapi tanu keenh dugun Bistaaraa||
Sorah jojan mukh tehi thayau | Turat pavan sut battis bhayau ||
Jas jas surasa badanu badhaava | Taasu doon kapi roop dekhaava ||
Sat jojan tehi aanan keenha | Ati laghu roop pavanasut leenha ||
Badan paithi puni baaher aava | Maaga bida taahi siru naava ||
Mohi suranh jehi laagi pathaava | Buddhi bal maramu tor mai paava||

Raam kaaju sabu karihahu tumh bal buddhi nidhaan|
Aasish dei gai so harashi chaleu Hanumaan ||
||Chopai||
Nisichari ek sindhu mahu rahai |Kari maaya nabhu ke khag gahai||
Jeev jantu je gagan udaahi |Jal biloki tinh kai parichhahi ||
Gahai chhah sak so na udaai |Ehi bidhi sada gaganchar khaai ||
Soi chhal Hanumaan kah keenha|Taasu kapatu kapi turatahi cheena||
Taahi maari maarut sut beera|Baaridhi paar gayau matidheera||
Taha jaai dekhi ban sobha|Gunjat chanchareek madhu lobha||
Naana taru phal phool suhaae|Khag mrug brund dekhi man bhaae||
Sail bisaal dekhi ek aage | Taa par dhaai chadheu bhay tyaage ||
Uma na kachhu kapi kai adhikaai | Prabhu prataap jo kaalahi khaai ||
Giri par chadhi Lanka tehi dekhi| Kahi na jaai ati durg biseshi ||
Ati utang jalanidhi chahu paasa|

|| Chhand ||
Kanak kot bichitra mani | Krut sundaraayatana Ghana||
Chauhatt hatt subatt beethee Chaaru pur bahu bidhi bana||
Gaj baaji khachchar nikar Padchar rath baroothanhi ko ganai|
Bahuroop nisichar jooth atibal Sen baranat nahin banai ||1||
Ban bag ujpaban baatika| Sar koop baapee sohahi||
Nar naag sur gandharb kanya| Roop muni man mohahee||
Kahu maal deh bisaal sai l Samaan atibal garjahi||
Naana akhaarenh bhirhi bahubidhi Ek ekanh tarjahee || 2||
Kari jatan bhat kotinh bikat Tan nagar chahu disi rachchhahee||
Kahu mahish maanush dhenu khar Ajakhal nishaachar bhachchhahi||
Ehi laagi Tulasidaas inh kee Katha kachhu ek hai kahee |
Raghubeer sar teerath sareeranhi Tyaagi gati paihahi sahee||
 
|| Doha – 3 ||
Pur rakhavaare dekhi bahu kapi man keenh bichaar|
Ati laghu roop dharau nisi nagar karau paisaar ||

||Chopai||
Masak samaan roop kapi charee | Lankahi chaleu sumiri naraharee||
Naam Lankinee ek nisicharee | So kah chalesi mohi nindaree ||
Jaanehi nahee maramu sath mora| Mor ahar jahaa lagi chora ||
Muthika ek maha kapi hanee | Rudhir bamat dharanee dhanamanee ||
Puni sambhari uthee so Lanka | Jori paani kar binay sasanka ||
Jab Ravanahi brahm bar deenha | Chalat biranchi kaha mohi cheenha ||
Bikal hosi tai kapi ke mare | Tab jaanesu nisichar sanghare ||
Taat mor ati punya bahoota | Dekheu nayan Raam kar doota ||
 
|| Doha – 4 ||
Taat swarg apabarg sukh dharia tula ek ang |
Tool na taahi sakal mili jo such lav satsang ||
||Chopai||
Prabisi nagar keeje sab kaaja | Hriday rakhi kosalapur raja ||
Garal sudha ripu karahi mitaai | Gopad sindhu anal sitalaai ||
Garud sumeru renu sam taahi | Raam krupa kari chitava jaahi ||

Ati laghu roop dhareu Hamumaana | Paitha ngar sumiri bhagawana ||
Mandir mandir prati kari sodha | Dekhe jah tah aganit jodha ||
Gayau dasaanan mandir maahee | Ati bichitra kahi jaat so naahee ||
Sayan kie dekha kapi tehee | Mandir mahu na deekhi baidehee ||
Bhavan ek puni deekh suhaava | Hari mandir tah bhinna banaava ||
 
|| Doha – 5 ||
Raamaayudh ankit gruh sobha barani na jaai |
Nav tulsika brund tah dekhi harash kapiraai||
||Chopai||
Lanka nisichar nikar nivaasa | Iha kaha sajjan kar baasa ||
Man mahu tarak karai kapi laaga | Tehi samay |Bibheeshanu jaaga ||
Raam raam tehi sumiran keenha | Hriday harash kapi sajjan cheenha ||
Ehi san hathi karihau pahichaanee |
Saadhu te hoi na kaaraj haanee ||

Bipra roop dhari bachan sunaae | Sunat Bibheeshan uthi tah aae ||
Kari pranaam poonchee kusalaai | Bipra kahahu nij katha buzaai ||
Kee tumh hari daasanh mah koi | More hriday preeti ati hoi ||
Kee tumh raamu deen anuraagee | Aayahu mohi karan badbhaagee ||

|| Doha – 6 ||
Tab Hanumant kahee sab Raam katha nij naam |
Sunat jugal tan pulak man magan sumiri gun graam||
||Chopai||
Sunahu pavansut rahani hamaaree | Jimi dasananhi mahu jeebh bichaaree ||
Taat kabahu mohi jaani anaatha | Karihahi krupa bhaanukul naatha ||
Taamas tanu kachu saadhan naahee |
Preeti na pad saroj man maahee ||
Ab mohi bha bharos Hanumanta |

8Binu harikrupa milahi nahi santa ||
Jau Rabhubeer anugrah keenha | Tau tumh mohi darasu hathi deenha ||
Sunahu Bibheeshan prabhu kai reetee | Karahi sada sevak par preetee ||
Kahahu kavan mai param kuleena | Kapi chanchal sabahee bidhi heena ||
Praat lei jo naam hamaara | Tehi din taahi na milai ahaara ||

|| Doha – 7 ||
As mai adham sakha sunu mohu par Rabhubeer |
Keenhee krupa sumiri gun bhare bilochan neer ||
||Chopai||
Jaanatahoo as swami bisaaree |
Phirhi te kaahe na hohi dukharee ||
Ehi bidhi kahat Raam gun graama |
Paava anirbachya bishraama ||
Puni sab katha Bibheeshan kahi |
Jehi bidhi Janakasuta tah rahee ||
Tab Hanumant kaha sunu bhraata |

Tav anucharee karau pan mora | Ek baar bilku mam ora ||
Trun dhari ot kahati baidehee | Sumiri avadhapati param sanehe
Sunu dasamukh khadyot prakasa | Kabahu ki nalinee karai bikaasa ||
As man samuzu kahati Jaanakee | Khal sudhi nahi Rabhubeer baan kee ||
Sath soone hari aanehi mohee | Adham nilajj laaj nahi tohee ||
 
|| Doha – 9 ||
Aapuhi suni khadyot sam Ramahi bhaanu samaan |
Parush bachan suni kaadhi asi bola ati khisiaan ||
||Chopai||
Sita tai mam krut apamaanaa |
Katihau tav sir kathin krupaanaa ||
Naahi ta sapadi maanu mam baanee |
Sumukhi hoti na ta jeevan haanee ||
Syaam saroj daam sam sundar |
Prabhu bhuj kari kar sam dasakandhar ||
So bhuj kanth ki tav asi ghora |

Sunu sath as pravaan pan mora ||
Chandrahaas haru mam paritaapam |
Rathupati birah anal sanjaatam ||
Sital nisit bahasi bar dhaara |
Kah Sita haru mam dukh bhaara ||
Sunat bachan puni maaran dhaava | Mayatanaya kahi neeti buzaava ||
Kahsi sakal nisicharanhi bolaai | Sitahi bahu bidhi traasahu jaai ||
Maas divas mahu kahaa na maana | Tau mai maarabi kaadhi krupaana ||
 
|| Doha – 10 ||
Bhavan gayau daskandhar iha pisaachini brund |
Sitahi traas dekhaavahi dharahi roop bahu mand||
||Chopai||
Trijata naam rachchhasi eka| Raam charan rati nipun bibeka||

Paavakmay sasi sravat na aagee| Maanahu mohi jaani hatabhaagee||
Sunahi binay mam bitap asoka| Satya naam karu haru mam soka||
Nootan kisalay anal samaana| Dehi agini jani karahi nidaana||
Dekhi param birahaakul sita| So chhan kapihi kalap sam beeta||
 
|| Doha – 12 ||
Kapi kari hriday bichaar deenhi mudrika daari tab|
Janu asok angaar deenh harashi uthi kar gaheu||
||Chopai||
Tab dekhee mudrika manohar | Raam naam ankit ati sundar ||
Chakit chitav mudaree pahichanee |
Harash bishaad hriday akulaanee||
Jeeti ko sakai ajay Raghuraai|
Maaya te asi rachi nahi jaai||
Sita man bichaar kar nana|
Madhur bachan boleu Hanumaana||
Raamchandra gun baranai laaga| Sunatahi Sita kar bukh bhaaga||

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Hanuman Chalisa Lyrics in Hindi/English (PDF)

Shri Hanuman Chalisa Lyrics is a Popular and most Famous Bhajan of Lord Hanuman, and in the Chalisa, there is a Great Description of Hanuman Ji is given.

With these Hanuman Chalisa Lyrics, you can sang Hanuman Chalisa anywhere, anytime, as the Lyrics is available in both English and Hindi.

Hanuman Chalisa Credits

Song/BhajanShri Hanuman Chalisa
Music Label T-Series
SingerHariharan
ComposerLALIT SEN, CHANDER
LyricistTulsi Das

Hanuman Chalisa Lyrics in Hindi

दोहा : श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।बरनऊं रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।। बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार।।

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर ।
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर ॥१॥

राम दूत अतुलित बल धामा ।
अञ्जनि-पुत्र पवनसुत नामा ॥२॥

महाबीर बिक्रम बजरङ्गी ।
कुमति निवार सुमति के सङ्गी ॥३॥

कञ्चन बरन बिराज सुबेसा ।
कानन कुण्डल कुञ्चित केसा ॥४॥
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै ।
काँधे मूँज जनेउ साजै ॥५॥

सङ्कर सुवन केसरीनन्दन ।
तेज प्रताप महा जग बन्दन ॥६॥

बिद्यावान गुनी अति चातुर ।
राम काज करिबे को आतुर ॥७॥

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया ।
राम लखन सीता मन बसिया ॥८॥

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा ।
बिकट रूप धरि लङ्क जरावा ॥९॥

भीम रूप धरि असुर सँहारे ।
रामचन्द्र के काज सँवारे ॥१०॥

लाय सञ्जीवन लखन जियाये ।
श्रीरघुबीर हरषि उर लाये ॥११॥

रघुपति कीह्नी बहुत बड़ाई ।
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई ॥१२॥

सहस बदन तुह्मारो जस गावैं ।
अस कहि श्रीपति कण्ठ लगावैं ॥१३॥

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा ।
नारद सारद सहित अहीसा ॥१४॥

जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते ।
कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते ॥१५॥

तुम उपकार सुग्रीवहिं कीह्ना ।
राम मिलाय राज पद दीह्ना ॥१६॥

तुह्मरो मन्त्र बिभीषन माना ।
लङ्केस्वर भए सब जग जाना ॥१७॥

जुग सहस्र जोजन पर भानु ।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू ॥१८॥

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं ।
जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं ॥१९॥

दुर्गम काज जगत के जेते ।
सुगम अनुग्रह तुह्मरे तेते ॥२०॥

राम दुआरे तुम रखवारे ।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे ॥२१॥

सब सुख लहै तुह्मारी सरना ।
तुम रच्छक काहू को डर ना ॥२२॥

आपन तेज सह्मारो आपै ।
तीनों लोक हाँक तें काँपै ॥२३॥

भूत पिसाच निकट नहिं आवै ।
महाबीर जब नाम सुनावै ॥२४॥

नासै रोग हरै सब पीरा ।
जपत निरन्तर हनुमत बीरा ॥२५॥

सङ्कट तें हनुमान छुड़ावै ।
मन क्रम बचन ध्यान जो लावै ॥२६॥

सब पर राम तपस्वी राजा ।
तिन के काज सकल तुम साजा ॥२७॥

और मनोरथ जो कोई लावै ।
सोई अमित जीवन फल पावै ॥२८॥

चारों जुग परताप तुह्मारा ।
है परसिद्ध जगत उजियारा ॥२९॥

साधु सन्त के तुम रखवारे ।
असुर निकन्दन राम दुलारे ॥३०॥

अष्टसिद्धि नौ निधि के दाता ।
अस बर दीन जानकी माता ॥३१॥

राम रसायन तुह्मरे पासा ।
सदा रहो रघुपति के दासा ॥३२॥

तुह्मरे भजन राम को पावै ।
जनम जनम के दुख बिसरावै ॥३३॥

अन्त काल रघुबर पुर जाई ।
जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई ॥३४॥

और देवता चित्त न धरई ।
हनुमत सेइ सर्ब सुख करई ॥३५॥

सङ्कट कटै मिटै सब पीरा ।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ॥३६॥

जय जय जय हनुमान गोसाईं ।
कृपा करहु गुरुदेव की नाईं ॥३७॥

जो सत बार पाठ कर कोई ।
छूटहि बन्दि महा सुख होई ॥३८॥

जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा ।
होय सिद्धि साखी गौरीसा ॥३९॥

तुलसीदास सदा हरि चेरा ।
कीजै नाथ हृदय महँ डेरा ॥४०॥

दोहा :पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप।।

Hanuman Chalisa Lyrics in English

Doha

Sri Guru Charan Saroj Raj Nij Man Mukur Sudhari, Baranau Raghuvar Bimal Jasu Jo Dayaku Ohal Chari II

Buddhiheen Tanu Janike Sumarau Pavan Kumar, Bal Buddhi Vidya Dehu Mohi Harau Kalesh Vikar II

Hanuman Chalisa:

Jai Hanuman gyan gun sagar
Jai Kapis tihun lok ujagar

Ram doot atulit bal dhama
Anjaani putra Pavan sut nama

Mahabir Bikram Bajrangi
Kumati nivar sumati ke sangi

Kanchan varan viraj subesa
Kanan kundal kunchit kesa

Hath vajra aur dhvaja viraje
Kaandhe moonj janeyu saje

Shankar suvan kesri nandan
Tej pratap maha jag vandan

Vidyavan guni ati chatur
Ram kaj karibe ko aatur

Prabu charitra sunibe ko rasiya
Ram Lakhan Sita man basiya

Sukshma roop dhari siyahi dikhava
Vikat roop dhari lank jarava

Bhima roop dhari asur sanghare
Ramachandra ke kaj sanvare

Laye Sanjivan Lakhan jiyaye
Shri Raghuvir harashi ur laye

Raghupati kinhi bahut badai
Tum mam priye Bharat hi sam bhai

Sahas badan tumharo yash gaave
Asa kahi Shripati kanth lagaave

Sankadhik Brahmadi Muneesa
Narad Saarad sahit Aheesa

Yam Kuber Digpaal jahan te
Kavi Kovid kahi sake kahan te

Tum upkar Sugreevahin keenha
Ram milaye rajpad deenha

Tumharo mantra Vibheeshan maana
Lankeshwar bhaye sab jag jana

Yug sahastra jojan par Bhanu
Leelyo tahi madhur phal janu

Prabhu mudrika meli mukh mahee
Jaladhi langhi gaye achraj nahee

Durgam kaj jagath ke jete
Sugam anugraha tumhre tete

Ram dwaare tum rakhvare
Hoat na agya binu paisare

Sub sukh lahae tumhari sar na
Tum rakshak kahu ko dar naa

Aapan tej samharo aapai
Teenhon lok hank te kanpai

Bhoot pisaach nikat nahin aavai
Mahavir jab naam sunave
Nase rog harae sab peera
Japat nirantar Hanumant beera

Sankat te Hanuman chudavae
Man kram vachan dhyan jo lavai

Sab par Ram tapasvee raja
Tin ke kaj sakal Tum saja

Aur manorath jo koi lavai
Soi amit jeevan phal pavai

Charon jug partap tumhara
Hai persidh jagat ujiyara

Sadhu Sant ke tum rakhware
Asur nikandan Ram dulhare

Ashta sidhi nav nidhi ke dhata
As var deen Janki mata

Ram rasayan tumhare pasa
Sada raho Raghupati ke dasa

Tumhare bhajan Ram ko pavai
Janam janam ke dukh bisraavai

Anth kaal Raghuvir pur jayee
Jahan janam Hari Bakht Kahayee

Aur Devta chit na dharahi
Hanumanth sehi sarve sukh karehi

Sankat kate mite sab peera
Jo sumirai Hanumat balbeera

Jai Jai Jai Hanuman Gosayin
Kripa karahu Gurudev ki nyahin

Jo sat bar path kare kohi
Chutahi bandhi maha sukh hohi

Jo yah padhe Hanuman Chalisa
Hoye siddhi sakhi Gaurisa

Tulsidas sada hari chera
Keejai nath hridaye mein dera

Pavan tanay sankat harana, Mangal moorati roop I
Ram Lakhan Sita sahit, Hridaya basahu sur bhoop I

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Sankat Mochan Hanuman Ashtak Lyrics in Hindi/English – By Hari Om

This Bhajan “Sankat Mochan Hanuman Ashtak Lyrics” is one of the most Popular Bhajan of Sankar Mochan Hanuman.

And Shri Hanuman is also known as Sankat Mochan because he kill all the Devils and Negetivity in the Society and that’s why all Hanuman Bhajan Lyrics are very Famous.

About Shri Hanuman (Sankat Mochan)

Lord Hanuman is a Hindu god and divine vanara companion of the god Rama. Hanuman is one of the central characters of the Hindu epic Ramayana. He is a Brahmachari (life long celibate) and one of the chiranjeevi. He is also mentioned in several other texts, such as the epic Mahabharata and the various Puranas.

Bhajan Credits

BHAJAN CREDITSDETAILS
SingerHARIHARAN
AlbumShree Hanuman Chalisa
Music DirectorLalit Sen, Chander

Sankat Mochan Hanuman Ashtak Lyrics in Hindi

बाल समय रवि भक्षी लियो तब,
तीनहुं लोक भयो अंधियारों।
ताहि सों त्रास भयो जग को,
यह संकट काहु सों जात न टारो।
देवन आनि करी बिनती तब,
छाड़ी दियो रवि कष्ट निवारो।
को नहीं जानत है जग में कपि,
संकटमोचन नाम तिहारो ॥ १ ॥

बालि की त्रास कपीस बसैं गिरि,
जात महाप्रभु पंथ निहारो।
चौंकि महामुनि साप दियो तब,
चाहिए कौन बिचार बिचारो।
कैद्विज रूप लिवाय महाप्रभु,
सो तुम दास के सोक निवारो ॥ २ ॥

अंगद के संग लेन गए सिय,
खोज कपीस यह बैन उचारो।
जीवत ना बचिहौ हम सो जु,
बिना सुधि लाये इहाँ पगु धारो।
हेरी थके तट सिन्धु सबे तब,
लाए सिया-सुधि प्राण उबारो ॥ ३ ॥

रावण त्रास दई सिय को सब,
राक्षसी सों कही सोक निवारो।
ताहि समय हनुमान महाप्रभु,
जाए महा रजनीचर मरो।
चाहत सीय असोक सों आगि सु,
दै प्रभुमुद्रिका सोक निवारो ॥ ४ ॥

बान लाग्यो उर लछिमन के तब,
प्राण तजे सूत रावन मारो।
लै गृह बैद्य सुषेन समेत,
तबै गिरि द्रोण सु बीर उपारो।
आनि सजीवन हाथ दिए तब,
लछिमन के तुम प्रान उबारो ॥ ५ ॥

रावन जुध अजान कियो तब,
नाग कि फाँस सबै सिर डारो।
श्रीरघुनाथ समेत सबै दल,
मोह भयो यह संकट भारो I
आनि खगेस तबै हनुमान जु,
बंधन काटि सुत्रास निवारो ॥ ६ ॥

बंधू समेत जबै अहिरावन,
लै रघुनाथ पताल सिधारो।
देबिन्हीं पूजि भलि विधि सों बलि,
देउ सबै मिलि मन्त्र विचारो।
जाये सहाए भयो तब ही,
अहिरावन सैन्य समेत संहारो ॥ ७ ॥

काज किये बड़ देवन के तुम,
बीर महाप्रभु देखि बिचारो।
कौन सो संकट मोर गरीब को,
जो तुमसे नहिं जात है टारो।
बेगि हरो हनुमान महाप्रभु,
जो कछु संकट होए हमारो ॥ ८ ॥

॥ दोहा ॥
लाल देह लाली लसे,
अरु धरि लाल लंगूर।
वज्र देह दानव दलन,
जय जय जय कपि सूर ॥

Sankat Mochan Hanuman Ashtak Lyrics in English

Baal samai ravi bhakshi liyo tab,
teenahu loka bhayo andhiyaro ।
Taahi so traas bhayo jag ko,
yah sankat kaahu so jaat na taaro ।
Dewan aani kari bintee tab,
chaadhi diyo ravi kasht niwaaro ।
Ko nahin jaanat hai jag mein kapi,
sankat mochan naam tihaaro ॥1॥

Baali ki traas kapees basai giri,
jaat mahaaprabhu panth nihaaro ।
Chownki mahaa muni saap diyo tab,
chahiy kaun bichaar bichaaro ।
Kai dwij roop liwaay mahaa prabhu,
so tum daas ke sok niwaaro ।
Ko nahin jaanat hai jag mein kapi,
sankat mochan naam tiharo ॥2॥

Angad ke sang lain gaye siya,
khoj kapees yah baain uchaaro ।
jeevat na bachihau hum son ju,
bina sudhi laay ehaan pagu dhaaro ।
Hayri thake tatt sindhu sabaai tab,
laay siya-sudhi praan ubaaro ।
Ko nahin jaanat hai jag mein kapi,
sankat mochan naam tiharo ॥3॥

Raavan traas dayee siya ko sab,
raakshashi so kahi sok nivaaro ।
Taahi samay hanuman mahaprabhu,
Jaay mahaa rajneechar maaro ।
Chaahat seeya asoka so aagi su,
dai prabhu mudrika soka nivaaro ।
Ko nahin jaanat hai jag mein kapi,
sankat mochan naam tiharo ॥4॥

Baan lagyo ur lakshiman ke tab,
praan taje sut raavan maaro ।
Lai griha baidya sushen samet,
tabai giri dron su beer upaaro ।
Aani sajeewan hath dayee taba,
lakshiman ke tum praan upaaro ।
Ko nahin jaanat hai jag mein kapi,
sankat mochan naam tiharo ॥5॥

Raavan yudh ajaan kiyo tab,
naag ki phaas sabhi sir daaro ।
Sri Raghunath samet sabai dal,
moh bhayo yah sankat bhaaro ।
Aani khagesh tabai hanumaan ju,
bandhan kaati sutraas nivaaro ।
Ko nahin jaanat hai jag mein kapi,
sankat mochan naam tiharo ॥6॥

Bandhu samet jabai ahiraavan,
lai raghunath pataal sidhaaro ।
Devhi puji bhalee vidhi so bali,
deu sabai mili mantra vichaaro ।
Jaay sahaay bhayo tab hi,
ahiraavan sainya samet sanhaaro ।
Ko nahin jaanat hai jag mein kapi,
sankat mochan naam tiharo ॥7॥

Kaaj kiye barh dewan kei tum,
beer mahaaprabhu dekhi bichaaro ।
Kaun so sankat mohin gareeb ko,
jo tumso nahin jaat hai taaro ।
Begi haro hanumaan mahaprabhu,
jo kuch sankat hoya hamaaro ।
Ko nahin jaanat hai jag mein kapi,
sankat mochan naam tiharo ॥8॥

॥ Doha ॥
Laal deh laalee lase,
aru dhari laal langoor ।
Bajra deh daanavdalan,
jai jai jai kapi soor ॥

Hey Dukh Bhanjan Maruti Nandan Lyrics in Hindi/English

This Bhajan “Hey Dukh Bhanjan Maruti Nandan Lyrics” of Maruti, and before composing the Bhajan Hari Om Sharan has Written this Bhajan.

And this Bhajan of Lord Hanuman become very much Popular as it comprises the Kid form of Hanuman.

Bhajan Credits

BHAJAN CREDITSDETAILS
Song Hey dukh bhanjan
ArtistBhajan India
SingerHari Om Sharan

Hey Dukh Bhanjan Maruti Nandan Lyrics in Hindi

You can also see Shiv Amritvani Lyrics

हे दुःख भन्जन, मारुती नंदन,
सुन लो मेरी पुकार ।
पवनसुत विनती बारम्बार ॥

अष्ट सिद्धि, नव निद्दी के दाता,
दुखिओं के तुम भाग्यविदाता ।
सियाराम के काज सवारे,
मेरा करो उधार ॥
पवनसुत विनती बारम्बार ।
॥ हे दुःख भन्जन…॥

अपरम्पार है शक्ति तुम्हारी,
तुम पर रीझे अवधबिहारी ।
भक्ति भाव से ध्याऊं तुम्हे,
कर दुखों से पार ॥
पवनसुत विनती बारम्बार ।
॥ हे दुःख भन्जन…॥

जपूं निरंतर नाम तिहरा,
अब नहीं छोडूं तेरा द्वारा ।
राम भक्त मोहे शरण मे लीजे,
भाव सागर से तार ॥
पवनसुत विनती बारम्बार ।

हे दुःख भन्जन, मारुती नंदन,
सुन लो मेरी पुकार ।
पवनसुत विनती बारम्बार ॥

Hey Dukh Bhanjan Maruti Nandan Lyrics in English

Hey Dukh Bhanjan, Maruti Nandan ।
Sun Lo Meri Pukar,
Pawansut Vinti Baarambaar ॥

Asht Siddhi Naw Nidhi Ke Data,
Dukhiyon Ke Tum Bhagya Vidhata ।
Siya-Ram Ke Kaj Sawanre,
Mera Kar Uddhar ॥
Pawansut Vinti Barambar ।
॥ Hey Dukh Bhanjan…॥

Aprampar Hai Shakti Tumhari,
Tum Par Reejhe Awadh Bihari ।
Bhakti Bhav Se Dhyaoo Tohe,
Kar Dukhho Se Par ॥
Pawansut Vinti Baarambaar ।
॥ Hey Dukh Bhanjan…॥

Japun Nirantar Naam Tihara,
Ab Nahi Chaudun Tera Dwara ।
Ram Bhakt Mohe Sharan Me Lije,
Bhav Sagar Se Taar ॥
Pawansut Vinti Baarambaar ।

Hey Dukh Bhanjan, Maruti Nandan ।
Sun Lo Meri Pukar,
Pawansut Vinti Baarambaar ॥

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Khush Honge Hanuman Ram Ram Kiye Jaa Lyrics in Hindi/English

This Bhajan “Khush Honge Hanuman Ram Ram Kiye Jaa Lyrics” is composed by Lakhbir Singh Lakha for the Bhakt of Hanuman and Shri Ram.

As in this Bhajan “Khush Honge Hanuman Ram Ram Kiye Jaa” the Singer is trying to say that you should pray for Shri Ram, and then Hanuman will be happy with there Devotees.

We can Play or Sing “Khush Honge Hanuman Ram Ram Kiye Jaa Lyrics” on the Occasion of Ram Navmi or Hanuman Jayanti.

Also Read: Shyam Teri Bansi Lyrics

Bhajan Credits

Khush Honge Hanuman Ram Ram Kiye Jaa Bhajan Credits 
Album/Company Khush Honge Hanuman Ram Ram Kiye Jaa/ T-Series
SingerLakhbir Singh Lakkha
Lyricist Traditional

Khush Honge Hanuman Ram Ram Kiye Jaa Lyrics in Hindi

सुबह शाम आठो याम यहीं नाम लिए जा
खुश होंगे हनुमान राम राम किए जा

लिखा था राम नाम वो, पथ्थर भी तर गए
किए राम से जो बैर, जीते जी वो मर गए
बस नाम का रसपान, ए इंसान किए जा
खुश होंगे हनुमान राम राम किए जा

राम नाम की धुन पे नाचे हो कर के मतवाला
बजरंगी सा इस दुनिया में कोई ना देखा भाला
जो भी हनुमत में दर पे आता, उसका संकट ताला
मुख में राम, तन में राम, जापे राम राम की माला

जहाँ राम का कीर्तन वही हनुमान जति हो
गोदी मे गणपति को लें शिव पार्वती हो
सियाराम की कृपा से सौ साल जिए जा
खुश होंगे हनुमान राम राम किए जा

जिसपे दया श्री राम की, बाका न बाल हो
उसका सहाय ‘लक्खा’ अंजनी का लाल हो
‘राजपाल’ तू हर हाल में जैकार किए जा
खुश होंगे हनुमान राम राम किए जा

Khush Honge Hanuman Ram Ram Kiye Jaa Lyrics in English

Subah shaam aatho yaam yaheen naam lie ja
Khush honge hanumaan raam raam kie ja

Likha tha raam naam vo, paththar bhee tar gae
Kie raam se jo bair, jeete jee vo mar gae
Bas naam ka rasapaan, e insaan kie ja
Khush honge hanumaan raam raam kie ja

Raam naam kee dhun pe naache ho kar ke matavaala
Bajarangee sa is duniya mein koee na dekha bhaala
Jo bhee hanumat mein dar pe aata, usaka sankat taala
Mukh mein raam, tan mein raam, jaape raam raam kee maala

Jahaan raam ka keertan vahee hanumaan jati ho
Godee me ganapati ko len shiv paarvatee ho
Siyaaraam kee krpa se sau saal jie ja
Khush honge hanumaan raam raam kie ja

Jisape daya shree raam kee, baaka na baal ho
Usaka sahaay ‘lakkha’ anjanee ka laal ho
‘Raajapaal’ too har haal mein jaikaar kie ja
Khush honge hanumaan raam raam kie ja

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Meri Sunlo Maruti Nandan Lyrics in Hindi/English – By Rakesh Kala

This “Meri Sunlo Maruti Nandan Lyrics” is one of the Best Bhajan of Hanuman, as Maruti is the “Kid Form” of the Lord Hanumana.

Rakesh Kala has composed this Bhajan of Maruti i.e. Hanuman, and this bhajan become the one of the most popular Bhajan of Hanuman.

Bhajan Credits:

Bhajan Credits of Meri Sunlo Maruti Nandan 
Song
Hanuman Amarat
Artist
Suresh Badekar
AlbumHanuman Amarat Vani

Meri Sunlo Maruti Nandan Lyrics in Hindi

मेरी सुनलो मारुति नंदन, काटो मेरे दुख के बंधन
हे महावीर बजरंगी, तुम्हे कहते है दुख भंजन
हे महावीर बजरंगी, तुम्हे कहते है दुख भंजन

मुझ पेर भी करुणा करना, मई आया शरण तुम्हारी
मई जोड़े हाथ खड़ा हूँ, तेरे दर का बना भिखारी
तुम सबसे बड़े भंडारी, मई पानी तुम हो चंदन
हे महावीर बजरंगी, तुम्हे कहते है दुख भंजन

मेरी सुनलो मारुति नंदन, काटो मेरे दुख के बंधन
हे महावीर बजरंगी, तुम्हे कहते है दुख भंजन

तेरा नाम बड़ा दुनिया में
सब तेरा ही गुण गये, इश्स जाग के सब नर नारी
चर्नो में शीश नवाए, कर भाव से पार मुझे भी
हे बाबा संकट मोचन, हे महावीर बजरंगी
तुम्हे कहते है दुख भंजन

मेरी सुनलो मारुति नंदन, काटो मेरे दुख के बंधन
हे महावीर बजरंगी, तुम्हे कहते है दुख भंजन

मैने तेरी आश् लगाई, बाबा हनुमान गुसा
जब भीड़ पड़ी भक्तो पे, तूने ही करी सहाइ
वीरान करे है दुहाई, प्रभु डीजो मोहे दर्शन
हे महावीर बजरंगी, तुम्हे कहते है दुख भंजन

मेरी सुनलो मारुति नंदन, काटो मेरे दुख के बंधन
हे महावीर बजरंगी, तुम्हे कहते है दुख भंजन

मेरी सुनलो मारुति नंदन, काटो मेरे दुख के बंधन
हे महावीर बजरंगी, तुम्हे कहते है दुख भंजन||

Meri Sunlo Maruti Nandan Lyrics in English

Hey Dukh Bhanjan, Maruti Nandan ।
Sun Lo Meri Pukar,
Pawansut Vinti Baarambaar ॥

Asht Siddhi Naw Nidhi Ke Data,
Dukhiyon Ke Tum Bhagya Vidhata ।
Siya-Ram Ke Kaj Sawanre,
Mera Kar Uddhar ॥
Pawansut Vinti Barambar ।
॥ Hey Dukh Bhanjan…॥

Aprampar Hai Shakti Tumhari,
Tum Par Reejhe Awadh Bihari ।
Bhakti Bhav Se Dhyaoo Tohe,
Kar Dukhho Se Par ॥
Pawansut Vinti Baarambaar ।
॥ Hey Dukh Bhanjan…॥

Japun Nirantar Naam Tihara,
Ab Nahi Chaudun Tera Dwara ।
Ram Bhakt Mohe Sharan Me Lije,
Bhav Sagar Se Taar ॥
Pawansut Vinti Baarambaar ।

Hey Dukh Bhanjan, Maruti Nandan ।
Sun Lo Meri Pukar,
Pawansut Vinti Baarambaar ॥

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